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"हरिगोविंद विश्वकर्मा लड़की के जन्म के लेते ही उसके कंधों पर परिवार की इज्जत का बोझ रख दिया जाता है। वह जैसे ही बोलना शुरू करती है, वैसे ही उसे सिखाया जाने लगता है- कैसे बैठना है। कैसे बोलना है। कितना हंसना है। कहां जाना है, कहां नहीं जाना है। और उम्र बढ़ने पर इन हिदायतों की जगह एक वाक्य ले लेता है- “ध्यान रखना बेटी, घर की इज्जत तुम्हारे हाथ में है।” है अजीब बात न! जिस समाज में परिवार की इज्जत सबकी होती है। हरिवार के हर सदस्य की होती है, उस परिवार में घर के इज्जत की रक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ स्त्री के ऊपर आ जाती है। इजज्त उसके कपड़ों से जुड़ जाती है। इज्जत उसके प्रेम से जुड़ जाती है। इज्जत उसके देर से घर लौटने से जुड़ जाती है। यहां तक कि उसके साथ कोई अपराध हो जाए, तब भी कई बार सवाल अपराधी से पहले उसके चरित्र पर उठते हैं। आखिर ऐसी इज्जत किस काम की, जिसे बचाने के लिए हर बार स्त्री को ही अपनी आजादी, अपनी पसंद और कभी-कभी अपना सच तक कुर्बान करना पड़े? इज्जत अगर सम्मान का दूसरा नाम है, तो वह स्त्री की चुप्पी में नहीं, उसके सम्मान के साथ जी पाने के अधिकार में होनी चाहिए।"
"यही वह सवाल है जिस पर हमारे समाज को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। इज्जत पूरे परिवार की होती है, लेकिन उसका बोझ अक्सर केवल स्त्री के कंधों पर क्यों डाल दिया जाता है? बेटी से कहा जाता है कि ऐसा मत करना, लोग क्या कहेंगे? बहू से कहा जाता है कि घर की मर्यादा बनाए रखना, नहीं तो लोग क्या कहेंगे? पत्नी से कहा जाता है कि उसके व्यवहार से पति और परिवार का सम्मान बनाए रखे, नहीं तो लोग क्या कहेंगे? लेकिन परिवार का कोई पुरुष गलत व्यवहार करे, किसी से दुर्व्यवहार करे, हिंसा करे या सार्वजनिक रूप से अपमानजनक आचरण करे, तो क्या उसकी जिम्मेदारी भी उसी तरह पूरे परिवार की “इज्जत” से क्या जोड़ी जाती है? नहीं, बिल्कुल भी नहीं। इस समाज ने इज्जत को भी जैसे स्त्री के चरित्र से जोड़ दिया है।"
"लड़की की हंसी, उसके कपड़े, उसकी दोस्ती, उसका प्रेम, उसकी नौकरी, देर से घर लौटना, इन तमाम बातों पर समाज की नजर रहती है। यहां तक कि कई बार उसके साथ होने वाले अपराध का दाग भी उसी के चरित्र पर लगा दिया जाता है। यह किस तरह की इज्जत है, जो गलत करने वाले से ज्यादा गलत सहने वाली से सवाल करती है? जो अपराधी से अधिक पीड़ित से सवाल करती है। किसी महिला के साथ छेड़छाड़ हो जाए तो अक्सर पूछा जाता है। वह वहां गई क्यों थी? देर रात बाहर क्यों थी? उसने ऐसे कपड़े कैसे पहने थे? किसी महिला को धोखा दिया जाए तो उसके फैसले पर सवाल उठते हैं। विवाह में उसके साथ हिंसा हो तो उसे समझाया जाता है कि घर की बात घर में रखो। ऐसा क्यों? क्या परिवार की इज्जत बचाने का अर्थ यह है कि स्त्री अपने साथ हुए अन्याय को भी छिपाती रहे?"
"अगर किसी घर में बेटी के साथ अन्याय हो रहा है, तो उसे चुप करा देना उस घर की इज्जत नहीं बचाता। बल्कि अन्याय के सामने खड़े होना उस परिवार के संस्कारों की असली परीक्षा है। इज्जत का अर्थ चुप्पी नहीं हो सकती। इज्जत का अर्थ भय भी नहीं हो सकता। और तो और इज्जत का अर्थ किसी स्त्री की स्वतंत्रता पर पहरा लगाना तो बिल्कुल भी नहीं हो सकता। दरअसल, आज समाज को इज्जत की अपनी परपरावादी परिभाषा बदलने की जरूरत है। किसी परिवार की प्रतिष्ठा इस बात से नहीं तय होनी चाहिए कि उसकी बेटी कितनी चुप है या उसकी बहू कितनी सहनशील। परिवार की असली इज्जत इस बात से तय होनी चाहिए कि वहां स्त्रियों के साथ कितना सम्मानजनक व्यवहार होता है। जिस घर में बेटी अपनी बात कह सकती है। बहू बिना डर के अपनी असहमति व्यक्त कर सकती है। पत्नी अपने निर्णयों में बराबर की भागीदार है, वही घर वास्तव में सम्मानित कहलाने योग्य है।"
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